Monday, November 23, 2009

( लघु कथा ) नटनागर ...


कमरे में आलमारी के बीचो बीचकरीब एक हाथ लम्बी सुंदर पुरूष आकृति वाली मूर्ति थी । उसके दोनों ओर डायरी वैगरह
पड़े थे । जैसे उनका काम ख़त्म हो गया है। ...शायद वे किसी दिन फुर्सत से देखे जायेंगे ...उसकी यादों में डूब कर ...यह वक्त कब आएगा ...आएगा भी या नहीं , कुछ कहा नहीं जा सकता ।
कमरे में आते ही बिना कपडे बदले बेद पर निढाल पड़ गई । सूजी आँखों से आंसू लुढकने लगे । ...सहसा उठ कर आलमारी से मूर्ति हाथ में लेकर आंसुओं से नहला दिया । कंधे पर पड़ा कृष्ण का पीताम्बर भींग गया । माला तितर - बितर हो गयी ...
उसे पता ही न चला कब और कितनी बार अनचाहे उसका सिरउसके कंधे पर टिक जाता । ...आज मूर्ति के कंधे का सहारा लिए रो रही थी । उसके प्यार का प्रतीक बर्षों से सभांल और सजा कर रखी गई थी ... नटनागर की मूर्ति । ...लेकिन इसमें राधा नहीं है । इसका उसे ध्यान न था ...वह तो ख़ुद को राधा समझने लगी थी । आंसू पोंछ उसे देखती रही फ़िर वापस यथा स्थान रख कर बाहर निकली और सीढ़ी चढ़ गई । आकाश गहरे काले बादलों से घिरा था ... किसी क्षण बरस सकता था । उसकी सांसे तेज हो आईं...गुमसुम निरुदेश्य अधेरे में ताकती रही , यूँ ही रात का एक लंबा दोर निकल गया ।

वह कब नीचे उतरी और कब उसका दरवाजा बंद हुआ , कोई नहीं जानता लेकिन बंद होने वाला आखिरी दरवाजा उसी का रहा होगा । वह सुबह देर तक बंद रह गया । ...जब तक की सामने खड़ी भीड़ ने उसे तोड़ नहीं डाला ।


( सभावना २००८)

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