Wednesday, December 2, 2009

धड़कती घड़ी ...

एक सुकून
ताजी सिहरन , धड़कती घड़ी
आलोड़ित कर देने वाला
वह कोमल ...
...अब छु ...आ ...
...अब छुआ ;
शीत की रात
कुंमकुंम से सजी
बिंदिया के बीच
छलक गई बूंद
घास पर पड़ा ओस कन...
...अब ढ ...र ...का ...
अब ढरका ;
चाँद की शीतल किरन
झांक रही
बदल की चुनरी से
गरम सांसें
ठिठकती हुई , करीब हो चली
और
पीपल का मनोरम पत्ता
अब हि...ला ...
अब हिला !

Monday, November 23, 2009

( लघु कथा ) नटनागर ...


कमरे में आलमारी के बीचो बीचकरीब एक हाथ लम्बी सुंदर पुरूष आकृति वाली मूर्ति थी । उसके दोनों ओर डायरी वैगरह
पड़े थे । जैसे उनका काम ख़त्म हो गया है। ...शायद वे किसी दिन फुर्सत से देखे जायेंगे ...उसकी यादों में डूब कर ...यह वक्त कब आएगा ...आएगा भी या नहीं , कुछ कहा नहीं जा सकता ।
कमरे में आते ही बिना कपडे बदले बेद पर निढाल पड़ गई । सूजी आँखों से आंसू लुढकने लगे । ...सहसा उठ कर आलमारी से मूर्ति हाथ में लेकर आंसुओं से नहला दिया । कंधे पर पड़ा कृष्ण का पीताम्बर भींग गया । माला तितर - बितर हो गयी ...
उसे पता ही न चला कब और कितनी बार अनचाहे उसका सिरउसके कंधे पर टिक जाता । ...आज मूर्ति के कंधे का सहारा लिए रो रही थी । उसके प्यार का प्रतीक बर्षों से सभांल और सजा कर रखी गई थी ... नटनागर की मूर्ति । ...लेकिन इसमें राधा नहीं है । इसका उसे ध्यान न था ...वह तो ख़ुद को राधा समझने लगी थी । आंसू पोंछ उसे देखती रही फ़िर वापस यथा स्थान रख कर बाहर निकली और सीढ़ी चढ़ गई । आकाश गहरे काले बादलों से घिरा था ... किसी क्षण बरस सकता था । उसकी सांसे तेज हो आईं...गुमसुम निरुदेश्य अधेरे में ताकती रही , यूँ ही रात का एक लंबा दोर निकल गया ।

वह कब नीचे उतरी और कब उसका दरवाजा बंद हुआ , कोई नहीं जानता लेकिन बंद होने वाला आखिरी दरवाजा उसी का रहा होगा । वह सुबह देर तक बंद रह गया । ...जब तक की सामने खड़ी भीड़ ने उसे तोड़ नहीं डाला ।


( सभावना २००८)

(लघु कथा ) बाँझ ...

पति ने दूसरी शादी कर ली थी । वह चीख रही है । उसने बहुत बुरा सपना देखा है । वह देख रही थी...
सड़क पर चारों ओरखून फैला है दो बच्चे पड़े हुए हैं । ...उनके मुंह से खून बह रहा है । एकाएक चारों ओर अँधेरा छ गया । फ़िर वहां धू_- धू कर आग जलने लगी । वह जाग उठी ...उसके मुंह से चीख निकल आई । धड़कनों पर काबू न था । कमरे में रौशनी काफी तेज थी। सहसा नजर बगल में सोये अपने बच्चे की ओर गयी । बच्चा बिस्तर से गायब था ...
चीख सुन कर दीपा दोड़ी हुई कमरे में आई । वह और तेज - तेज चीखने लगी -
"दीपा ...दीपा...मेरे बच्चे को कोई उठा ले गया "...
दीपा की आँखों में आंसू भर आए । उसी ने कमरे की सफाई करते वक्त बच्चे नुमा बने कपडे के गट्ठर को दूसरी जगह रख दिया था ...


(संभावना २००८ )

Tuesday, November 17, 2009

जब उनके आँगन में मेरी हँसी खिलती थी ...

वो
हमेशा कहा करते थे
तुम्हारी हँसी जन्नत है
तुम्हारी हँसी मेरी धड़कन है
वो हमेशा कहा करते थे ...
जी करता है तुम्हारी हँसी चूम लूँ
और सजा कर रख लूँ
अपनी तनहाइयों में ,
वो उस समय बहुत कहा करते थे
तुम्हारी हँसी से
बहुत सारा उजाला आ गया है
उनके घर में ,
उनकी जिंदगी में ,
वो हमेशा कहा करते थे ...
हाँ! वो उसे बांहों में लेकर कहते थे
फ़िर...फ़िर...
ऐसा क्यों हुआ
की अचानक उन्होंने ही
बुझा दी मेरी हँसी
एक झटके में ...

Tuesday, October 20, 2009

वह उससे प्रेम करता है ...

वह हमेशा इनकार करता है
उसके बच्चे का पिता होने से
क्योंकि ,वह उससे प्रेम करता है
अत्यन्त गहराई से
बार - बार पिता बनने के करीब जाकर
हत्या कर डालता है
उसके हुलसते - छलकते मातृत्व की ।
वह उससे प्रेम करता है
इसका दावा कई बार ठोक चुका है
कहता है-
किसी और की हो जायेगी
तो, वह जरुर पागल हो जाएगा
साथ ही यह भी कहता है
कि -वक्त हर चीज की बड़ी अच्छी दवा होता है
सरे दिन दूसरी लड़कियों के आजू- बाजू मंडराते
अपनी तेज निगाहों से
उन्हें टटोलता - मसलता हुआ
अंधेरे में उसके पास आकर
सच्चे प्रेमी की भूमिका में
तब्दील हो जाया करता है ।
अक्सर ही -
उसकी रोती आँखों को झ्झोंड कर कहता है -
कितनी नैरो मैन्देद लड़की है
कितना छोटा सोचती है
या फ़िर -
हमारी-तुम्हारी बुनियाद में फर्क है
वह उसकी तरह केंद्रित नहीं रह सकता
क्योंकि , जिंदगी के तंग होने का खतरा है
एक जगह अटके पानी में
सडांध पैदा हो जाया करती है
वह उससे सचमुच प्रेम करता है
और अपनी माँ की बताई
लड़की से विवाह - रस्म करने तक
प्रेम करेगा ।
वह तो यहाँ तक कहता है
कि - विवाह के बाद भी
सबसे ऊपर उसी को रखेगा
उससे भी प्रेम करेगा
बस वह भरोसा रखे ...
ऐसे में सचमुच
मैं डिक्शनरी उठा कर
ढूढने लगती हूँ
भरोसा माने ...???


मणिबेन पटेल (हैदराबाद विश्वविद्यालय )
( अप्रैल ०९ , वर्तमान साहित्य )