( लघु कथा ) नटनागर ...
कमरे में आलमारी के बीचो बीचकरीब एक हाथ लम्बी सुंदर पुरूष आकृति वाली मूर्ति थी । उसके दोनों ओर डायरी वैगरह
पड़े थे । जैसे उनका काम ख़त्म हो गया है। ...शायद वे किसी दिन फुर्सत से देखे जायेंगे ...उसकी यादों में डूब कर ...यह वक्त कब आएगा ...आएगा भी या नहीं , कुछ कहा नहीं जा सकता ।
कमरे में आते ही बिना कपडे बदले बेद पर निढाल पड़ गई । सूजी आँखों से आंसू लुढकने लगे । ...सहसा उठ कर आलमारी से मूर्ति हाथ में लेकर आंसुओं से नहला दिया । कंधे पर पड़ा कृष्ण का पीताम्बर भींग गया । माला तितर - बितर हो गयी ...
उसे पता ही न चला कब और कितनी बार अनचाहे उसका सिरउसके कंधे पर टिक जाता । ...आज मूर्ति के कंधे का सहारा लिए रो रही थी । उसके प्यार का प्रतीक बर्षों से सभांल और सजा कर रखी गई थी ... नटनागर की मूर्ति । ...लेकिन इसमें राधा नहीं है । इसका उसे ध्यान न था ...वह तो ख़ुद को राधा समझने लगी थी । आंसू पोंछ उसे देखती रही फ़िर वापस यथा स्थान रख कर बाहर निकली और सीढ़ी चढ़ गई । आकाश गहरे काले बादलों से घिरा था ... किसी क्षण बरस सकता था । उसकी सांसे तेज हो आईं...गुमसुम निरुदेश्य अधेरे में ताकती रही , यूँ ही रात का एक लंबा दोर निकल गया ।
वह कब नीचे उतरी और कब उसका दरवाजा बंद हुआ , कोई नहीं जानता लेकिन बंद होने वाला आखिरी दरवाजा उसी का रहा होगा । वह सुबह देर तक बंद रह गया । ...जब तक की सामने खड़ी भीड़ ने उसे तोड़ नहीं डाला ।
( सभावना २००८)
Monday, November 23, 2009
(लघु कथा ) बाँझ ...
पति ने दूसरी शादी कर ली थी । वह चीख रही है । उसने बहुत बुरा सपना देखा है । वह देख रही थी...
सड़क पर चारों ओरखून फैला है दो बच्चे पड़े हुए हैं । ...उनके मुंह से खून बह रहा है । एकाएक चारों ओर अँधेरा छ गया । फ़िर वहां धू_- धू कर आग जलने लगी । वह जाग उठी ...उसके मुंह से चीख निकल आई । धड़कनों पर काबू न था । कमरे में रौशनी काफी तेज थी। सहसा नजर बगल में सोये अपने बच्चे की ओर गयी । बच्चा बिस्तर से गायब था ...
चीख सुन कर दीपा दोड़ी हुई कमरे में आई । वह और तेज - तेज चीखने लगी -
"दीपा ...दीपा...मेरे बच्चे को कोई उठा ले गया "...
दीपा की आँखों में आंसू भर आए । उसी ने कमरे की सफाई करते वक्त बच्चे नुमा बने कपडे के गट्ठर को दूसरी जगह रख दिया था ...
(संभावना २००८ )
Tuesday, November 17, 2009
जब उनके आँगन में मेरी हँसी खिलती थी ...
वो हमेशा कहा करते थे
तुम्हारी हँसी जन्नत है
तुम्हारी हँसी मेरी धड़कन है
वो हमेशा कहा करते थे ...
जी करता है तुम्हारी हँसी चूम लूँ
और सजा कर रख लूँ
अपनी तनहाइयों में ,
वो उस समय बहुत कहा करते थे
तुम्हारी हँसी से
बहुत सारा उजाला आ गया है
उनके घर में ,
उनकी जिंदगी में ,
वो हमेशा कहा करते थे ...
हाँ! वो उसे बांहों में लेकर कहते थे
फ़िर...फ़िर...
ऐसा क्यों हुआ
की अचानक उन्होंने ही
बुझा दी मेरी हँसी
एक झटके में ...
वो हमेशा कहा करते थे
तुम्हारी हँसी जन्नत है
तुम्हारी हँसी मेरी धड़कन है
वो हमेशा कहा करते थे ...
जी करता है तुम्हारी हँसी चूम लूँ
और सजा कर रख लूँ
अपनी तनहाइयों में ,
वो उस समय बहुत कहा करते थे
तुम्हारी हँसी से
बहुत सारा उजाला आ गया है
उनके घर में ,
उनकी जिंदगी में ,
वो हमेशा कहा करते थे ...
हाँ! वो उसे बांहों में लेकर कहते थे
फ़िर...फ़िर...
ऐसा क्यों हुआ
की अचानक उन्होंने ही
बुझा दी मेरी हँसी
एक झटके में ...
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